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ममता बनर्जी और विपक्ष अगर सीईसी के खिलाफ प्रस्ताव लाते भी हैं, तो सबसे बड़ी चुनौती 'नंबर गेम' की है
कोलकाता। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने के संकेत दिए हैं। ममता ने साफ किया है कि अगर कांग्रेस या राहुल गांधी इस तरह का प्रस्ताव लाते हैं, तो तृणमूल कांग्रेस इस पर अपनी पार्टी के भीतर चर्चा करेगी और समर्थन दे सकती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट जाने के सवाल पर उन्होंने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बयान के बाद चर्चा शुरू हो गई है कि क्या विपक्ष वाकई सीईसी को हटाने के लिए संसद का दरवाजा खटखटाएगा? आखिर इसकी प्रक्रिया है?
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया वही है, जो सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाने की है। यह प्रक्रिया काफी जटिल और लंबी होती है। इसे महाभियोग जैसी प्रक्रिया कहा जाता है। इसके लिए मिसविहैवियर या अक्षमता का आरोप साबित होना जरूरी शर्त है।भारत के इतिहास में आज तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा उनके पद से नहीं हटाया गया है। 1990 के दशक में टी।एन। शेषन के कड़े फैसलों को लेकर राजनीतिक दलों में भारी नाराजगी थी। उस वक्त उनके खिलाफ महाभियोग लाने की चर्चाएं बहुत गरम हुई थीं, लेकिन कभी प्रस्ताव पेश नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी। रामास्वामी (1993) के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव संसद में लाया गया था और जांच समिति ने उन्हें दोषी भी पाया था। लेकिन लोकसभा में वोटिंग के दौरान कांग्रेस ने वोट नहीं किया, जिससे प्रस्ताव गिर गया और वे हटने से बच गए।
ममता बनर्जी और विपक्ष अगर सीईसी के खिलाफ प्रस्ताव लाते भी हैं, तो सबसे बड़ी चुनौती 'नंबर गेम' की है। प्रस्ताव को पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है, जो वर्तमान में एनडीए सरकार के प्रचंड बहुमत को देखते हुए विपक्ष के पास नहीं है। ऐसे में यह कदम कानूनी से ज्यादा 'राजनीतिक दबाव' बनाने वाला साबित हो सकता है।